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तोड़फोड़ किसी भी दल में हो फायदे में रहती है BJP, 5 साल में पौने दो सौ से ज्यादा विधायकों ने ली शरण

गोवा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर, पश्चिम बंगाल या फिर महाराष्ट्र. देश में कही भी किसी भी राजनीतिक दल में तोड़फोड़ होती है तो सबसे ज्यादा फायदे में बीजेपी रहती है.

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तोड़फोड़ किसी भी दल में हो फायदे में रहती है BJP, 5 साल में पौने दो सौ से ज्यादा विधायकों ने ली शरण

गोवा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर, पश्चिम बंगाल या फिर महाराष्ट्र. देश में कही भी किसी भी राजनीतिक दल में तोड़फोड़ होती है तो सबसे ज्यादा फायदे में बीजेपी रहती है. महाराष्ट्र में भी यही होता दिख रहा है. अगर उद्धव ठाकरे की सरकार गिरती है तो फायदे में बीजेपी ही होगी और उसकी सरकार बन जाएगी. इसके अलावा बागी विधायक या तो बीजेपी में विलय कर लेंगे या फिर अलग पार्टी बना सकते हैं. एडीआर के आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले 5 साल में 405 विधायकों ने अपनी पार्टी छोड़ी और इनमें से करीब 45 प्रतिशत विधायकों ने बीजेपी ज्वाइन कर लिया. एडीआर की यह रिपोर्ट पिछले साल मार्च में आई थी और इसमें 2016 से 2020 तक विधायकों के पार्टी छोड़ने की घटनाओं का अध्ययन किया गया था.

खबर में खास
  • बीजेपी को क्यों होता है सबसे ज्यादा फायदा
  • पार्टी छोड़ने वाले विधायकों का सक्सेस रेट
  • इस अवधि में 28 सांसदों ने छोड़ी पार्टी
बीजेपी को क्यों होता है सबसे ज्यादा फायदा

एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि 2016 से 2020 के बीच देश भर में 405 विधायकों ने पार्टी छोड़ी थी और इनमें से 182 विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया था. पार्टी छोड़ने वाले 38 विधायक कांग्रेस में गए थे तो 25 तेलंगाना राष्ट्र समिति में, 16 तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे. नेशनल पीपुल्स पार्टी में 16, जनता दल यू में 14, बीएसपी और तेलुगुदेशम में 11—11 विधायक शामिल हुए थे. बगावत का सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस को हुआ. कांग्रेस के 170 विधायकों ने पार्टी को अलविदा कह दिया. वहीं बीजेपी के 18 विधायकों ने पार्टी को बाय बाय कहा तो बीएसपी और तेलुगुदेशम के 17—17 विधायकों ने अपनी अलग राह चुन ली. 2016—21 के दौरान शिवसेना का एक भी ऐसा विधायक नहीं था जिसने पार्टी छोड़ी हो.

पार्टी छोड़ने वाले विधायकों का सक्सेस रेट

आम तौर पर राजनेता चुनावी साल में पार्टी छोड़ते हैं या फिर बगावत करते हैं. हालांकि कई बार देखने को मिलता है कि बीच में भी किसी पार्टी में बगावत शुरू हो जाती है. कर्नाटक और मध्य प्रदेश में ऐसा हो चुका है. हालांकि ऐसे विधायकों का सक्सेस रेट क्या है, इस बारे में एडीआर की रिपोर्ट कहती है कि 357 विधायक ऐसे थे जिन्होंने उसी समय दूसरी पार्टी में जाकर चुनाव लड़ा और इनमें से 170 ही चुनाव जीत पाए. 48 विधायकों ने दूसरी पार्टी के टिकट पर चुनाव उपचुनाव लड़ा और इनमें से 39 ही जीत पाए. आंकड़ों के अनुसार, अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाकर उपचुनाव लड़कर जीतने वाले विधायकों का सक्सेस रेट काफी ज्यादा है. वहीं विधानसभा चुनाव लड़ने वाले विधायकों का सक्सेस रेट काफी कम है.

इस अवधि में 28 सांसदों ने छोड़ी पार्टी

विधायकों के बाद अब बात करते हैं सांसदों की जिन्होंने 2016 से 2020 के बीच पार्टी को अलविदा कहा. इन सांसदों में 12 लोकसभा के तो 16 राज्यसभा के थे. बीजेपी के 5 लोकसभा सांसदों ने पार्टी को अलविदा कहा था. वहीं कांग्रेस के 7 राज्यसभा सांसद पार्टी से जुदा हुए थे. सांसदों की बगावत का फायदा बीजेपी और कांग्रेस दोनों को हुआ. बीजेपी छोड़ने वाले 5 लोकसभा सांसद कांग्रेस में चले गए थे तो 10 राज्यसभा सांसदों ने बीजेपी ज्वाइन कर ली थी.

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