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JDU-BJP तलाक से राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह फंसे, क्या सोमनाथ चटर्जी की राह पकड़ेंगे?

महागठबंधन सरकार में भी नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी पर राजद नेता तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) बैठेंगे. विपक्ष में बीजेपी (BJP) अकेली बैठेगी. वहीं इस पूरे घटनाक्रम में राज्यसभा के उप सभापति और जदयू के वरिष्ठ नेता हरिवंश नारायण सिंह (Harivansh Narayan Singh) फंस गए हैं. अब उनके अगले फैसले पर सभी की निगाहें होंगी.

Harivansh Narayan Singh
राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह (File Photo: ANI)

बिहार में जेडीयू-बीजेपी (JDU-BJP) का तलाक हो गया है. नीतीश कुमार ने एक बार फिर से तेजस्वी से हाथ मिलाते हुए NDA को टाटा-बाय-बाय बोल दिया है. आज (बुधवार) दोपहर महागठबंधन सरकार का शपथ ग्रहण होगा और फिर से नीतीश कुमार (Nitish Kumar) मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी पर राजद नेता तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) बैठेंगे. जीतनराम मांझी, कांग्रेस और लेफ्ट भी उनका समर्थन करेंगे. इस तरह से विपक्ष में बीजेपी (BJP) अकेली बैठेगी. इस उलटफेर से पटना से लेकर दिल्ली तक की सियासत में बड़े बदलाव होने जा रहे हैं. इस पूरे घटनाक्रम में राज्यसभा के उप सभापति और जदयू के वरिष्ठ नेता हरिवंश नारायण सिंह (Harivansh Narayan Singh) फंस गए हैं. अब उनके अगले फैसले पर सभी की निगाहें होंगी.

इस खबर में ये है खास

  • बतौर उप-सभापति सबको प्रभावित किया
  • बलिया के रहने वाले हैं हरिवंश नारायण
  • पत्रकारिता जगत में भी नाम कमाया
  • नीतीश कुमार ही राजनीति में लेकर आए
  • राज्यसभा में तीसरे गैर कांग्रेसी उपसभापति
  • क्या सोमनाथ चटर्जी की राह पकड़ेंगे?

बतौर उप-सभापति सबको प्रभावित किया

राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह का संबंध नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू से है. बतौर उप-सभापति वे सदन को अच्छे से संचालित करते हैं. सदन चलाने की उनकी काबिलियत के चलते ही पीएम मोदी ने उन्हें दूसरी बार उप सभापति बनाने का निर्णय लिया था. विपक्ष में भी ऐसा कोई नेता नहीं है जो उन पर भेदभाव करने का आरोप लगाता हो. सरकार में पीएम मोदी से उनके अच्छे संबंध हैं. मीडिया में वे मोदी सरकार की नीतियों की खुलकर तारीफ करते थे. हालांकि अब जेडीयू ने बीजेपी से संबंध तोड़ लिए हैं. इसलिए अब उनकी भूमिका भी देखने वाली होगी.

बलिया के रहने वाले हैं हरिवंश नारायण

हरिवंश नारायण सिंह का जन्म 30 जून 1956 को यूपी के बलिया में हुआ. हरिवंश ने अपनी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा गांव के सटे टोला काशी राय स्थित स्कूल से शुरू की. उसके बाद जेपी इंटर कालेज सेवाश्रम से 1971 में हाईस्कूल पास करने के बाद वे वाराणसी पहुंचे. वहां यूपी कॉलेज से इंटरमीडिएट और उसके बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक किया और पत्रकारिता में डिप्लोमा की डिग्री हासिल की और अपने करियर की शुरुआत टाइम्स ग्रुप से की.

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पत्रकारिता जगत में भी नाम कमाया

राजनीति से पहले पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय थे. उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की हिंदी पत्रिका धर्मयुग से पत्रकारिता की शुरुआत की. फिर कोलकाता के आनंद बाजार पत्रिका समूह की हिंदी पत्रिका से जुड़े. 1989 में रांची से प्रकाशित अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक बने. चार दशकों की सक्रिय पत्रकारिता में उन्होंने कई मीडिया संस्थानों में काम किया है. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अतिरिक्त मीडिया सलाहकार के रूप में भी कार्य किया है.

नीतीश कुमार ही राजनीति में लेकर आए

बतौर पत्रकार हरिवंश बाबू ने बिहार में काफी दिनों काम किया. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने बिहार से जुड़े गंभीर विषयों को प्रमुखता से उठाया. इसी दौरान वह नीतीश कुमार के करीब आए. नीतीश कुमार ही उन्हें सक्रिय राजनीति में लेकर आए. नीतीश ने उन्हें जेडीयू का महासचिव बनाया. साल 2014 में जेडीयू ने हरिवंश को राज्यसभा के लिए नामांकित किया और इस तरह से हरिवंश पहली बार संसद तक पहुंचे.

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राज्यसभा में तीसरे गैर कांग्रेसी उपसभापति

साल 2014 में हरिवंश नारायण पहली बार उच्च सदन पहुंचे. अपने पहले ही भाषण में उन्होंने सभी को प्रभावित किया. उच्च सदन में बिहार के मुद्दों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं. 2017 में नीतीश कुमार वापस बीजेपी में आ गए. इसी बीच राज्यसभा के तत्कालीन उप सभापति पीजे कुरियन का कार्यकाल खत्म हो गया. मोदी सरकार में जेडीयू कोटे से हरिवंश नारायण को पहली बार उप सभापति बनाया गया. 1952 के बाद तीसरे ऐसे गैर कांग्रेसी थे. जो उप सभापति बने.

क्या सोमनाथ चटर्जी की राह पकड़ेंगे?

बीजेपी-जेडीयू के तलाक से हरिवंश नारायण के निर्णय देखने वाले होंगे. सवाल उठ रहे हैं कि क्या आने वाले समय में हरिवंश नारायण सिंह को भी दिवंगत नेता सोमनाथ चटर्जी की तरह राजनीति से सन्यास लेना पड़ेगा. दरअसल जो स्थिति आज हरिवंश नारायण सिंह के सामने खड़ी हुई है, वैसी ही लोकसभा अध्यक्ष रहते समय सोमनाथ चटर्जी के सामने आई थी. साल 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु संधि के मुद्दे पर वामदलों ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. उस वक्त सोमनाथ चटर्जी, लोकसभा अध्यक्ष के पद पर थे. पार्टी ने उनसे इस्तीफा देने का कहा. लेकिन वे पार्टी की न सुनते हुए वह स्पीकर पद पर बने रहे. जिसका हर्जाना उन्हें भुगतना पड़ा और पार्टी ने अनुशासन का पालन न करने के आरोप के साथ पार्टी से बेदखल कर दिया. उनका कहना था कि लोकसभा अध्यक्ष के पद पर बैठा व्यक्ति किसी दल का नहीं होता.

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