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अरुण गोयल को चुनाव आयुक्त नियुक्त करने पर विवाद, SC ने जताई नाराजगी, 10 प्वॉइंट में जानें पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट में आज (24 नवंबर) फिर से इस मामले में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र से कुछ सवाल किए. कोर्ट ने पूछा कि जब कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही थी तो इतनी जल्दी नियुक्ति क्यों की गई?

Arun Goel
अरुण गोयल को चुनाव आयुक्त में नियुक्त करने पर विवाद (File Photo: ANI)

अरुण गोयल को चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त करने पर विवाद हो गया है. केंद्र सरकार के इस काम पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है. सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में केंद्र सरकार पर बड़ी तल्ख टिप्पणी की है. कोर्ट में आज (24 नवंबर) फिर से इस मामले में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र से कुछ सवाल किए. कोर्ट ने पूछा कि जब कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही थी तो इतनी जल्दी नियुक्ति क्यों की गई?

10 प्वॉइंट में समझें पूरा मामला

  1. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि वह जानना चाहते हैं कि अरुण गोयल की चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त करते समय कोई अनुचित कदम तो नहीं उठाए गए हैं. उन्होंने VRS लिया और अगले ही दिन चुनाव आयुक्त नियुक्त करने की जल्दबाजी क्यों की गई है?
  2. मई में CEC सुशील चंद्रा के सेवानिवृत्त होने के बाद निर्वाचन आयोग में एक रिक्ति हुई थी. केंद्र सरकार ने उनकी जगह ही 19 नवंबर को अरुण गोयल की नियुक्त की है. फरवरी 2025 में मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार सेवानिवृत्त होने वाले हैं. उसके बाद गोयल ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त होंगे. बता दें कि गोयल 1985 बैच के पंजाब कैडर के आईएएस अधिकारी हैं.
  3. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की फाइल मांगते हुए केंद्र सरकार से कहा है नियुक्ति कानूनन सही है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. इसे केवल रिकॉर्ड के लिए रखा जाएगा.
  4. कोर्ट ने कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त को इतना मजबूत होना चाहिए कि अगर कल प्रधानमंत्री के ऊपर भी किसी गलती का आरोप लगता है, तो वह अपना दायित्व निभा सके. अदालत ने कहा कि प्रयास एक ऐसी प्रणाली को स्थापित करना है, जिसमें “सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति” को सीईसी के रूप में चुना जा सके.
  5. यह सुनवाई कोर्ट ने भविष्य में कॉलेजियम सिस्टम के तहत CEC और EC की नियुक्ति की प्रक्रिया पर 23 अक्टूबर 2018 को दायर की गई एक याचिका पर की है. इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्र एकतरफा चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति करती है.
  6. कोर्ट ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1991 के तहत CEC का कार्यकाल छह साल का है, लेकिन किसी भी CEC ने 2004 से अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है. अदालत ने कहा कि सरकार जो कर रही है वह यही है.
  7. कोर्ट ने कहा कि चाहे वह यूपीए की सरकार हो या मौजूदा सरकार दोनों की यही प्रवृत्ति रही है. अदालत ने कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 324 में ऐसी नियुक्तियों के लिए प्रक्रिया प्रदान करने के लिए एक कानून बनाने की परिकल्पना की गई थी, लेकिन सरकार ने अभी तक ऐसा नहीं किया है.
  8. कोर्ट ने कहा कि हम सिर्फ प्रक्रिया को समझना चाह रहे हैं कि जो लोग चुने जा रहे वह CEC के पद पर 6 साल क्यों नहीं रह पाते हैं. इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि नाम लिए जाते समय वरिष्ठता, रिटारमेंट, उम्र आदि को देखा जाता है. इसकी पूरी व्यवस्था है. यह यूं ही नहीं किया जाता.
  9. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के लिए परामर्श प्रक्रिया में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल करने से निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित होगी. कोर्ट ने कहा कि केंद्र में कोई भी सत्तारूढ़ दल सत्ता में बने रहना पसंद करता है और मौजूदा व्यवस्था के तहत पद पर एक “यस मैन” (हां में हां मिलाने वाला व्यक्ति) नियुक्त कर सकता है.
  10. सुप्रीम कोर्ट कुछ याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है जिसमें निर्वाचन आयुक्तों (EC) और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी प्रणाली का अनुरोध किया गया है. केंद्र ने दलील दी कि 1991 के अधिनियम ने सुनिश्चित किया है कि निर्वाचन आयोग अपने सदस्यों के वेतन और कार्यकाल के मामले में स्वतंत्र रहता है और ऐसा कोई बिंदु नहीं है जो अदालत के हस्तक्षेप को वांछित करता हो.

नियुक्ति में इतनी जल्दबाजी क्यों?

कोर्ट ने कहा कि ये पद 15 मई से खाली था. तो अचानक 24 घंटे से भी कम समय में नाम भेजे जाने से लेकर उसे मंजूरी देने की सारी प्रक्रिया पूरी कर दी गई. 15 मई से 18 नवंबर के बीच क्या हुआ? कोर्ट ने दूसरा सवाल किया कि कानून मंत्री ने 4 नाम भेजे थे, लेकिन सवाल ये है कि यही 4 नाम क्यों भेजे गए? उसमें से सबसे जूनियर अधिकारी को क्यों चुना गया? इस पद पर नियुक्ति से ठीक एक दिन पहले ही उन्होंने VRS क्यों लिया.

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