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क्या है राजद्रोह कानून और धारा 124ए, जिसकी समीक्षा करने जा रही है मोदी सरकार?

मोदी सरकार (PM Modi) राजद्रोह कानून (Sedition Law in India) की समीक्षा करने जा रही है और सरकार की ओर से इस बारे में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में हलफनामा दायर कर जानकारी दी गई है.

मोदी सरकार (Modi Govt) राजद्रोह कानून (Sedition Law in India) की समीक्षा करने जा रही है और सरकार की ओर से इस बारे में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में हलफनामा दायर कर जानकारी दी गई है. अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर राजद्रोह कानून क्या है, जिसकी समीक्षा मोदी सरकार करने जा रही है. दरअसल, राजद्रोह कानून को भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए में परिभाषित किया गया है. भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए में कहा गया है कि अगर कोई शख्स सरकार विरोधी सामग्री लिखता है, सरकार विरोधी बातें बोलता है या ऐसी किसी सामग्री का समर्थन करता है या फिर राष्ट्रीय प्रतीकों को नीचा दिखाने की कोशिश करता है तो उसके खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज हो सकता है. अगर ये सब काम कोई देशविरोधी संगठन करता है तब भी राजद्रोह का मामला दर्ज किया जा सकता है.

खबर में खास
  • अंग्रेजों के जमाने में 1870 में लागू किया गया था कानून
  • 2016 से 2019 के बीच राजद्रोह के मामले 160 प्रतिशत बढ़े
  • एनसीआरबी के अनुसार किस साल राजद्रोह के कितने केस
  • दोषी पाया जाना तो दूर, अधिकांश के खिलाफ चार्जशीट भी नहीं
  • राजद्रोह कानून को लेकर क्या सुझाव था विधि आयोग का
  • 10 मई को सुप्रीम कोर्ट पीठ को लेकर विचार करने वाली थी
  • 2 दिन पहले ही केंद्र सरकार ने किया था कानून का बचाव
  • अकसर विवादों में रहा है राजद्रोह कानून, लगते रहे आरोप
अंग्रेजों के जमाने में 1870 में लागू किया गया था कानून

राजद्रोह कानून को ब्रिटिश जमाने में 1870 में लागू किया गया था और तब ब्रिटेन की सरकार के खिलाफ काम करने वालों पर इस कानून का इस्तेमाल किया जाता रहा. अगर किसी व्यक्ति पर राजद्रोह का केस दर्ज हो गया तो वह सरकारी नौकरी के लिए आवेदन नहीं कर सकता. राजद्रोह गैर जमानती अपराध है और अपराध की प्रवृति के हिसाब से इसमें तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है. इसके अलावा इस कानून में जुर्माने का भी प्रावधान है.

2016 से 2019 के बीच राजद्रोह के मामले 160 प्रतिशत बढ़े

एनसीआरबी के डेटा के अनुसार, 2016 से 2019 के बीच राजद्रोह के मामलों में 160 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि इस कानून में सजा की दर महज 3.3 प्रतिशत ही है. कुछ जानकार राजद्रोह कानून को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानते हैं. हाल के सालों में सोशल मीडिया पर लिखने को लेकर भी राजद्रोह की धाराएं लगाई जा चुकी हैं और सुप्रीम कोर्ट कई बार इस पर चिंता जाहिर कर चुका है. खास बात यह है कि अंग्रेजों के जमाने का यह कानून ब्रिटेन में ही खत्म हो चुका है और उसके उपनिवेश रहे देशों में भी इस कानून का अब अस्तित्व नहीं रह गया है. अंग्रेजों के जमाने में यह कानून महात्मा गांधी और लाला लाजपत राय पर भी लगाया गया था.

NCRB के अनुसार किस साल राजद्रोह के कितने केस
  • 2015 में 30
  • 2016 में 35
  • 2017 में 51
  • 2018 में 70
  • 2019 में 93
दोषी पाया जाना तो दूर, अधिकांश के खिलाफ चार्जशीट भी नहीं

2019 में 96 लोग पकड़े गए. 76 के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई और 29 बरी कर दिए गए. केवल 2 लोग राजद्रोह में दोषी करार दिए गए. 2018 में राजद्रोह के आरोप में 56 लोग पकड़े गए और 46 के खिलाफ ही चार्जशीट दायर की गई, लेकिन कोर्ट ने 2 को ही दोषी माना. 2017 की बात करें तो 228 लोगों को राष्ट्रद्रोह के आरोप में पकड़ा गया, जिनमें से 160 के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई और 4 लोग ही दोषी करार दिए गए. 2016 में 48 लोगों को राजद्रोह के आरोप में पकड़ा गया और 26 के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई और महज 1 व्यक्ति को ही दोषी पाया गया. 2015 में इस कानून के तहत 73 लोगों की धरपकड़ हुई. 13 के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई पर कोई भी दोषी नहीं पाया गया. 2014 में 58 लोग पकड़े गए, 16 के खिलाफ चार्जशीट हुई और 1 को कोर्ट ने दोषी माना.

राजद्रोह कानून को लेकर क्या सुझाव था विधि आयोग का

2018 में भारतीय विधि आयोग या इंडियन लॉ कमीशन ने राजद्रोह कानून को लेकर एक परामर्श पत्र जारी किया था, जिसमें कहा गया था— लोगों को अपने तरीके से देशभक्ति जाहिर करने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए. विचारों की अभिव्यक्ति कुछ के लिए कठोर और कुछ के लिए अप्रिय हो सकती है, लेकिन यह सब राजद्रोह के तहत नहीं आने चाहिए. राजद्रोह केवल उन मामलों में लागू किया जाना चाहिए, जिसके पीछे की मंशा सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने या हिंसा और अवैध साधनों से सरकार को उखाड़ फेंकने की है.

लॉ कमीशन ने कहा था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गैर जिम्मेदाराना प्रयोग राजद्रोह नहीं हो सकता. तत्कालीन सरकार की नीतियों से मेल न खाने वाले विचार व्यक्त करने के लिए किसी पर राजद्रोह की धारा नहीं लगाया जाना चाहिए.

10 मई को सुप्रीम कोर्ट पीठ को लेकर विचार करने वाली थी

10 मई को राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को लेकर सुनवाई होनी थी, जिसमें तय किया जाना था कि याचिकाओं को 5 सदस्यीय पीठ को भेजा जाए या फिर 7 सदस्यीय पीठ को. सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में केंद्र से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा था और अब मोदी सरकार की ओर से हलफनामा दायर कर राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार का संकेत दिया गया है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार न करे और केंद्र की ओर से पुनर्विचार की कवायद का इंतजार करे.

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2 दिन पहले ही केंद्र सरकार ने किया था कानून का बचाव

दो दिन पहले केंद्र सरकार ने राजद्रोह कानून यानी आईपीसी की धारा 124 ए जैसे दंडात्मक कानून का बचाव किया था और कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय के 1962 में संविधान पीठ ने इसकी वैधता बरकरार रखी थी और इसके दुरुपयोग के उदाहरण इसके पुनर्विचार के लिए कारण नहीं हो सकते. केंद्र सरकार ने राजद्रोह कानून को काफी असरदार भी बताया था और उसे साबित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कई तर्क भी दिए गए थे. केंद्र सरकार ने यह भी कहा था कि इस कानून में कुछ भी गलत नहीं है, इसलिए इस पर पुनर्विचार की जरूरत भी नहीं है.

अकसर विवादों में रहा है राजद्रोह कानून, लगते रहे आरोप

बता दें कि राजद्रोह कानून अकसर विवादों में रहता है और इसमें पकड़े गए लोगों के गुनाह ज्यादातर साबित नहीं हो पाते, क्योंकि राजनीतिक द्वेष से इस धारा का दुरुपयोग ज्यादा होता है. सरकारों पर आरोप लगता रहा है कि वह अपने प्रतिद्वंद्वियों से बदला लेने की भावना से इस कानून का दुरुपयोग करती रही हैं. कई बार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने भी राजद्रोह कानून को लेकर सवाल उठाए हैं. जुलाई 2019 में राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में गृह मंत्रालय की ओर से कहा गया था कि देशद्रोह से निपटने वाले आईपीसी के तहत प्रावधानों को खत्म करने का कोई प्रावधान नहीं है. सरकार ने उस समय यह भी कहा था कि राष्ट्रविरोधी, अलगाववादी और आतंकी तत्वों से निपटने के लिए इस प्रावधान को बनाए रखने की जरूरत है.

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