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कांशीराम के जन्मदिन पर मायावती ने किसे चमचा बता दिया ?

. मायावती ने कहा कि आज के ‘चमचा युग’ में बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के मिशन पर डटे रहना बहुत बड़ी बात है लेकिन बसपा अपने आंदोलन के दम पर इस मुहिम को आगे बढ़ा रही है.

kanshiram Birthday
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लखनऊ: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयंती पर आज उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद आज के राजनीतिक परिदृश्य और बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर तथा कांशीराम की प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे. मायावती ने कहा कि आज के ‘चमचा युग’ में बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के मिशन पर डटे रहना बहुत
बड़ी बात है लेकिन बसपा अपने आंदोलन के दम पर इस मुहिम को आगे बढ़ा रही है.

खबर में खास

  • आम्बेडकर के मिशन पर डटे रहना आसान नहीं
  • दलितों का उत्थान ही कांशीराम को सच्ची श्रद्धांजलि
  • कौन है कांशीराम ?

आम्बेडकर के मिशन पर डटे रहना आसान नहीं

मायावती ने कहा वर्तमान राजनीति में चमचों का प्रभाव है, ऐसे में बाबा साहेब डॉक्टर आम्बेडकर मिशन पर अपने अर्जित धन के बल पर टिके रहना कोई साधारण बात नहीं है. यह बड़ी बात है और बहुजन समाज के आंदोलन की देन है इसके बल पर ही बसपा ने उत्तर प्रदेश में कई ऐतिहासिक सफलताएं अर्जित की हैं. उन्होंने कहा कि हम आगे भी अपने उसूलों के साथ संघर्ष में लगातार डटे रहना है.

दलितों का उत्थान ही कांशीराम को सच्ची श्रद्धांजलि

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम को याद करते हुए मायावती ने कहा कि देश के करोड़ों दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और अन्य उपेक्षित वर्गों को लाचारी की जिंदगी से निकाल कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के बसपा के संघर्ष के दृढ़ संकल्प के साथ लगातार डटे रहना ही कांशीराम को सच्ची श्रद्धांजलि होगी. उन्होंने कहा कि कांशीराम ने आम्बेडकर के आत्म सम्मान और स्वाभिमान के मानवतावादी अभियान को जीवंत बनाने के लिए पूरी जिंदगी कड़ा संघर्ष किया एवं कई
कुर्बानियां दीं. उन्होंने कहा कि इसके बल पर बसपा ने काफी सफलता अर्जित की और देश की राजनीति को नया आयाम दिया.

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कौन है कांशीराम ?

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के बाद दलितों के उत्थान के लिए अगर किसी का नाम सर्वमान्य रुप से लिया जाता है तो वो है कांशीराम. दलितों के उत्थान के उद्देश्य से कांशीराम ने 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का गठन किया था. देश में दलितों को मुख्य धारा की राजनीति में लाने और उन्हें उनके अधिकोरों के प्रति जागरुक बनाने का श्रेय कांशीराम को ही
जाता है.

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