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फूलपुर लोकसभा सीट क्यों है नीतीश कुमार की पहली पसंद?

NDA से नाता तोड़कर राजद से हाथ मिलाकर भी अपनी कुर्सी बचाने वाले नीतीश कुमार के उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने की इंडिया अहेड की खबर पर अब खुलकर बात होने लगी है. नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष लल्लन सिंह ने भी इस खबर से इंकार नहीं किया है.

Nitish Kumar Phulpur
उत्तर प्रदेश का फूलपुर लोकसभा सीट क्यों है नीतीश कुमार की पहली पसंद?

Lok Sabha Election 2024: NDA से नाता तोड़कर राजद से हाथ मिलाकर भी अपनी कुर्सी बचाने वाले नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने की इंडिया अहेड की खबर पर अब खुलकर बात होने लगी है. नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष लल्लन सिंह ने भी इस खबर से इंकार नहीं किया है. एक तरह से इंडिया अहेड की खबर की पुष्टि हो चुकी है. बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश की फूलपुर सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं. खुद लल्लन सिंह ने यह बात कही है. अब सवाल उठता है कि नीतीश कुमार फूलपुर संसदीय सीट से ही क्यों चुनाव लड़ना चाहते हैं?

खबर में ख़ास
  • आज़ादी के बाद अंतिम समय तक पंडित नेहरू थे सांसद
  • सामजिक-जातीय समीकरण को मुफीद मान रहे नीतीश
  • कुर्मी-पटेलों का साथ, सपा और बसपा का हो हाथ
  • फूलपुर संसदीय सीट का इतिहास
  • इसलिए भी अहम है फूलपुर संसदीय सीट
  • फूलपुर संसदीय सीट के बारे में
  • नीतीश कुमार का चुनावी इतिहास
आज़ादी के बाद अंतिम समय तक पंडित नेहरू थे सांसद

सबसे बड़ी बात तो यह है कि फूलपुर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की सीट रही है. वे जीवन पर्यन्त इस सीट से सांसद रहे थे. 1952, 1957 और 1962 में उन्होंने फूलपुर सीट से जीत हासिल की थी. 1962 के चुनाव में उन्होंने राममनोहर लोहिया को चुनाव में हराया था. माना जाता है कि नीतीश कुमार खुद को पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों के काफी करीब मानते हैं. पिछले दिनों जब RCP सिंह ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को लेकर राजनीतिक बयानबाजी की थी तो नीतीश कुमार काफी नाराज हुए थे.

सामजिक-जातीय समीकरण को मुफीद मान रहे नीतीश

इसके अलावा फूलपुर का सामजिक और जातीय समीकरण नीतीश कुमार के लिए काफी मुफीद माना जा रहा है. यहां सबसे ज्यादा संख्या दलितों की है. उनकी संख्या 18 फीसद से भी ज्यादा है. दूसरे नंबर पर यहां पटेल और कुर्मी वोटर हैं, जिनकी संख्या करीब 13 फीसद से ज्यादा है. 12 फीसद से ज्यादा संख्या मुसलमानों की है और 11 फीसद से ज्यादा यहां ब्राह्मण हैं. वैश्य 5 फीसद से ज्यादा, कायस्थ 5 फीसद, राजपूत 4 फीसद से ऊपर और 2 फीसद से ज्यादा भूमिहार हैं. इस तरह कुल 23 प्रतिशत सवर्ण आबादी यहाँ पर है. मौर्या और अन्य जातियां यहाँ 16 फीसद के आसपास हैं.

कुर्मी-पटेलों का साथ, सपा और बसपा का हो हाथ

नीतीश कुमार के मन में जो बात चल रही है, वो ये है कि यहां के कुर्मी और पटेलों को साधा जाए और उसके बाद समाजवादी पार्टी का साथ हासिल किया जाए. अगर ऐसा होता है तो फूलपुर का राजनीतिक और सामाजिक समीकरण बदल सकता है. सपा के अलावा अगर बहुजन समाज पार्टी का साथ भी मिल जाता है तो नीतीश कुमार की राह और आसान हो जायेगी.

फूलपुर संसदीय सीट का इतिहास
  • 1952, 1957 और 1962 के आम चुनाव में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फूलपुर सीट से जीत हासिल की थी
  • 1964 में पंडित नेहरू के निधन के बाद इस सीट पर उपचुनाव में विजयलक्ष्मी पंडित ने जीत हासिल की
  • 1967 में हुए चुनाव में विजयलक्ष्मी पंडित ने एक बार जीत दर्ज की थी लेकिन 2 साल बाद संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि बनने के बाद उन्होंने सांसदी छोड़ दी थी.
  • 1969 में हुए उपचुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के जनेश्वर मिश्रा ने कांग्रेस को यहां पटकनी देते हुए केशवदेव मालवीय को मात दे दी थी
  • 1971 के लोक सभा चुनाव में वीपी सिंह ने कांग्रेस को यह सीट वापस दिलाई.
  • 1977 के आम चुनाव में राष्ट्रिय लोकदल की कमला बहुगुणा यहां से चुनाव जीत गईं
  • 1980 में कांग्रेस ने केंद्र की सरकार में जोरदार वापसी की पर फूलपुर सीट जनता पार्टी सेक्युलर के नेता बीडी सिंह चुनाव जीत गए
  • 1984 के आम चुनाव में आखिरी बार कांग्रेस यहां से जीते और रामपूजन पटेल यहां से कांग्रेस के आखिरी सांसद रहे.
  • 1989 और 1991 के चुनाव में रामपूजन पटेल जनता दल के टिकट पर लड़े और जीते भी.
  • 1996 में यहां सपा का कब्जा हो गया.
  • 2004 में अतीक अहमद यहां से सांसद बने थे.
  • 2009 में बसपा के कपिल मुनि करवरिया ने जीत हासिल की.
  • 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ओर से केशव प्रसाद मौर्या ने यहां अपना दबदबा दिखाया.
  • 2017 में केशव प्रसाद मौर्या UP के डिप्टी CM बन गए तो उन्होंने सांसदी छोड़ दी थी. उसके बाद उपचुनाव में नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल ने सपा को फिर यहां से जीत दिलाई.
  • 2019 में फूलपुर सीट से फिर से बीजेपी ने अपना परचम लहराया, जबकि केसरी देवी पटेल ने यह सीट जीत ली थी.
इसलिए भी अहम है फूलपुर संसदीय सीट

पूरा विपक्ष जानता है कि पीएम मोदी को घेरना है तो UP में घेरना जरूरी है और नीतीश कुमार से बेहतर ये बात कोई और कौन जान सकता है. फूलपुर वाराणसी से 100 KM के दायरे में है. ऐसा नहीं है कि पीएम मोदी को इससे पहले वाराणसी में घेरने की कोशिश नहीं हुई लेकिन सफलता नहीं मिली. पीएम मोदी के खिलाफ आम आदमी पार्टी नेता अरविन्द केजरीवाल भी दांव आजमा चुके हैं पर उन्हें सफलता नहीं मिली थी. इस तरह विपक्ष की सोच यह है कि सीधे वाराणसी में घुसकर मुकाबला करने के बदले आसपास की सीटों पर किलेबंदी पर फोकस किया जाए.

फूलपुर संसदीय सीट के बारे में
  • पूर्वी UP का हिस्सा है और प्रयागराज जिले में स्थित है.
  • बिहार की सीमा से ज्यादा दूर नहीं है
  • पीएम मोदी की वाराणसी लोकसभा सात के पास स्थित है और इससे पीएम मोदी को मुकाबला देने की सूरत बन सकती है.
  • बिहार की सीमा से लगी UP की लोकसभा सीटों पर इसका असर हो सकता है.
नीतीश कुमार का चुनावी इतिहास
  • नीतीश कुमार 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लोक सभा का चनाव जीत चुके हैं.
  • नीतीश कुमार 1995 में अंतिम बार विधानसभा चुनाव लड़े थे. इस तरह लोकसभा चुनावों के लिहाज से वे ज्यादा सफल हैं
  • नीतीश कुमार 1977 में पहली बार जनता पार्टी के टिकट पर बिहार विधानसभा के लिए हरनौत सीट से चुनाव लड़े पर हार गए.
  • 1980 में जनता पार्टी सेक्युलर के टिकट पर हरनौत से ही भाग्य आजमाया पर इस बार भी हार गए
  • 1985 में पहली बार बिहार विधानसभा के लिए हरनौत सीट से जीते
  • 1989 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़े और जीत गए
  • 1991 में वे फिर लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद पहुंचे
  • 1996 और 1998 में भी लोकसभा का चुनाव जीते
  • 1999 में 5वीं बार लोकसभा के लिए चुने गए.
  • 2004 में नालंदा से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे
  • 2006, 2012 और 2018 में बिहार विधान परिषद के सदस्य बने

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