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ज्ञानवापी केस में मुस्लिम पक्ष के दावे को कमजोर करेगा 1936 का फैसला?, देखिए अंग्रेज जजों ने क्या कहा था

वाराणसी कोर्ट कल दोपहर 2 बजे इस पर अपना फैसला सुनाएगी. वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है. जिसमें मौजूद मस्जिद को अवैध बताया गया है, लिहाजा उस पर 1991 का कानून लागू नहीं होता.

Gyanvapi Masjid Survey
Gyanvapi Masjid

वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi Masjid) में शिवलिंग (Shivling) मिलने के दावे पर हंगामा मचा हुआ है. आज वाराणसी की जिला कोर्ट (Varanasi Court) में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों ने जोरदार बहस की. दोनों तरफ की दलीलें सुनकर कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. अब कोर्ट कल दोपहर 2 बजे इस पर अपना फैसला सुनाएगी. वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है. जिसमें मौजूद मस्जिद को अवैध बताया गया है, लिहाजा उस पर 1991 का कानून लागू नहीं होता.

इस खबर में ये है खास

  • सदियों पुराना है ये विवाद
  • विवाद को लेकर कई दंगें हुए
  • 1936 में ब्रिटिश ट्रायल कोर्ट का फैसला
  • सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दायर

सदियों पुराना है ये विवाद

ये विवाद आज का नहीं है और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब ये विवाद कोर्ट में गया हो. इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो पाएंगे कि बनारस पर मुगलों ने कई बार आक्रमण किया और 1194 से 1669 के बीच काशी विश्वनाथ मंदिर को कई बार तोड़ा गया. इतिहासकारों के मुताबिक सन 1194 में मोहम्मद गौरी ने बनारस पर हमला किया था. उस मुगल आक्रांता ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर खूब लूटपाट की थी. इसके बाद मंदिर का फिर से पुर्निर्माण कराया गया. सन 1447 में जौनपुर के सुल्तान ने इसे फिर नष्ट कर दिया. दावों के अनुसार आखिरी बार इस मंदिर को साल 1585 में बनाया गया था, लेकिन औरंगजेब ने उसे तोड़कर वहां पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण करा दिया था.

विवाद को लेकर कई दंगें हुए

काशी विश्वनाथ के जिस भव्य मंदिर को आज दुनिया देख रही है उसका निर्माण साल 1777 में इंदौर की मराठा शासक रानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा करवाया गया था. 1930 के दशक में इस विवाद के वकील रहे कैलाशनाथ काटजू ने अपनी किताब में लिखा है कि महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा बनवाए गए मंदिर के गुंबद पर 50 साल बाद पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का पत्तर चढ़वाया था. उन्होंने लिखा कि इस विवाद की वजह से काशी में बार-बार दंगे होते रहे हैं. 1810 के बाद से इन दंगों के दस्तावेज भी उपलब्ध हैं.

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1936 में ब्रिटिश ट्रायल कोर्ट का फैसला

ज्ञानवापी परिसर को लेकर सबसे पहला मुकदमा 1936 में दीन मोहम्मद बनाम राज्य सचिव का था. तब दीन मोहम्मद ने निचली अदालत में याचिका दायर कर ज्ञानवापी मस्जिद और उसकी आसपास की जमीनों पर अपना हक बताया था. अदालत ने इसे मस्जिद की जमीन मानने से इनकार कर दिया था. इसके बाद दीन मोहम्मद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की. 1937 में हाईकोर्ट ने मस्जिद के ढांचे को छोड़कर बाकी सभी जमीनों पर वाराणसी के व्यास परिवार का हक जताया और उनके पक्ष में फैसला दिया.

सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दायर

वाराणसी कोर्ट की सुनवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दायर हुई है. बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने यह याचिका दायर की है. याचिका में कहा गया है कि 1991 का कानून किसी धार्मिक स्थल के स्वरूप को निर्धारित करने से नहीं रोकता. इसके अलावा इस्लामिक सिद्धान्तों के आधार पर भी देखे तो मन्दिर तोड़कर बनाई गई कोई भी मस्जिद वैध नहीं हो सकती. याचिका के मुताबिक एक बार मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हो जाने पर जब तक कि विसर्जन की प्रकिया द्वारा मूर्तियों को वहां से हटाया न जाए तब तक उसका वह स्वरूप मौजूद माना जाता है.

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