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‘हम रहें या ना रहें…’, PM मोदी को झुकाने के लिए नीतीश ने अपना सबकुछ दांव पर लगाया, तेजस्वी की लगी लॉटरी

बिहार में तेजस्वी यादव के पलटू चाचा ने एक बार फिर से पलटी मारी और महागठबंधन के साथ सरकार बना ली. बिहार के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं. प्रदेश की जनता नीतीश के इस गेम को पहले भी कई बार देख चुकी है. अब इस नए समीकरण में हर कोई नफा-नुकसान का आंकलन कर रहा है.

Nitish Kumar
मोदी को झुकाने के लिए नीतीश कुमार ने अपना सबकुछ दांव पर लगाया

राजनीति में स्थाई कुछ भी नहीं होता है… बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस कहावत के जीवंत उदाहरण बन चुके हैं. बिहार में तेजस्वी यादव के पलटू चाचा ने एक बार फिर से पलटी मारी और महागठबंधन के साथ सरकार बना ली. बिहार के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं. प्रदेश की जनता नीतीश के इस गेम को पहले भी कई बार देख चुकी है. अब इस नए समीकरण में हर कोई नफा-नुकसान का आंकलन कर रहा है. हम भी आपको थोड़ा समझाने की कोशिश कर रहे हैं.

इस खबर में ये है खास

  • रातों-रात नहीं हुआ इतना बड़ा उलटफेर
  • नीतीश को मोदी कभी पसंद नहीं आए
  • बीजेपी की इस बात से डर गए थे नीतीश
  • तेजस्वी की तो मानो लॉटरी लग गई

रातों-रात नहीं हुआ इतना बड़ा उलटफेर

ऐसा भी नहीं कि ये उलटफेर रातों-रात हुआ हो, इसकी पटकथा भी महीनों पहले से लिखी जा रही थी. यदि आपको याद हो तो तेजस्वी यादव ने इफ्तार पार्टी के बहाने ये सियासी खिचड़ी पकानी शुरू की थी. इसी दावत से नीतीश और तेजस्वी फिर से नजदीक आए और बीजेपी को सत्ता से दूध में पड़ी मक्खी की तरह उठाकर बाहर फेंक दिया. बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को नीतीश कुमार कभी हजम नहीं कर पाए. बीजेपी की सीटें ज्यादा होने के पीछे वो चिराग पासवान को ही बड़ा कारण मानते हैं और इसके पीछे बीजेपी की साजिश मानते हैं.

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नीतीश को मोदी कभी पसंद नहीं आए

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नीतीश कुमार ने पहली बार बीजेपी से नाता नहीं तोड़ा है. वे इससे पहले 2013 में भी एनडीए से बाहर हो गए थे. उन्होंने उस वक्त भी नरेंद्र मोदी के कारण रिश्ता तोड़ा था और एक बार फिर से उनके निशाने पर पीएम मोदी ही हैं. महागठबंधन में शामिल होने के नीतीश ने पीएम मोदी का नाम लिए बिना ही उनपर निशाना साधा. अब सवाल ये है कि नीतीश को पीएम मोदी से इतनी दिक्कत क्यों है? इसका सीधा सा जवाब है दोनों ही नेता लगभग एक ही समय में मुख्यमंत्री बने थे. मोदी आज प्रधानमंत्री बन गए, जबकि नीतीश वहीं के वहीं रह गए.

बीजेपी की इस बात से डर गए थे नीतीश

बिहार में बीजेपी ने जैसे ही मुकेश सहनी को ठिकाने लगाया उससे नीतीश कुमार काफी डर गए थे. इसके बाद महाराष्ट्र में जो शिवसेना के साथ उसने नीतीश के इस डर को और बढ़ा दिया. नीतीश को डर सताने लगा कि बीजेपी तो अपने साथियों को भी नहीं छोड़ती है. इसी बीच आरसीपी सिंह से नीतीश की दूरी बढ़ गई. मोदी मंत्रिमंडल में होने के कारण मोदी-शाह से उनकी मुलाकातें लाजिमी थीं, लेकिन नीतीश को लगा कि आरसीपी सिंह के जरिए बीजेपी कोई बड़ा गेम प्लान कर रही है. उन्होंने बीजेपी को सबक सिखाने का फैसला लिया और महागठबंधन में शामिल हो गए.

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तेजस्वी की तो मानो लॉटरी लग गई

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इस पूरे घटनाक्रम में देखें तो ना जेडीयू और ना ही बीजेपी को फायदा हो रहा है. हां तेजस्वी यादव की लॉटरी जरूर लगी है. तेजस्वी यादव के राजनीतिक जीवन पर नजर डालें तो नीतीश ने ही तेजस्वी को अपने बगल वाली सीट में बिठाकर राजनीति का ककहरा सिखाया था. महज दो-ढाई साल के अनुभव से ही तेजस्वी ने 2020 में हुए विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार के छक्के छुड़ा दिए थे. यदि आखिरी मौके पर पीएम मोदी ने मैदान नहीं संभाला होता तो आज नीतीश भी विपक्ष में बैठे होते. अब तेजस्वी को एक और मौका मिल गया है. तेजस्वी का वोटबैंक एकजुट होगा, जबकि आरजेडी विरोधी नीतीश का कोर वोटर बीजेपी में शिफ्ट हो सकता है. मतलब साफ है कि नीतीश ने अपना सबकुछ दांव पर लगाकर मोदी को झुकाने की कोशिश की है.

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