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राजस्थान: सचिन पायलट की ताजपोशी आसान नहीं, अशोक गहलोत ही नहीं, ये चुनौतियां हैं उनकी राह में रोड़ा

अशोक गहलोत ने विधायकों की बैठक बुलाकर अपना शक्ति प्रदर्शन किया. इससे कांग्रेस नेतृत्व को साफ संकेत दिया कि ज्यादातर विधायक उनके साथ हैं. एक बात और है कि गहलोत के समर्थकों के साथ कई वरिष्ठ विधायक भी पायलट के अंडर में काम करने को तैयार नहीं दिख रहे हैं.

Ashok Gehlot-sachin Pilot
CM अशोक गहलोत और सचिन पायलट (File Photo)

नई दिल्ली. कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव (Congress President Election) को लेकर गुरुवार को अधिसूचना जारी हो गई है. 24 सितंबर से कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू होगी, जो कि 30 सितंबर तक चलेगी. राहुल गांधी के कांग्रेस की कमान संभालने को ‘ना’ कहने के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) का कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है. गहलोत के चुनाव लड़ने की चर्चा के साथ राजस्थान में नेतृत्व बदलाव की भी चर्चा शुरू हो गई है. हालांकि अशोक गहलोत साफ कर चुके हैं कि वह कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ेंगे.

इस खबर में ये है खास-

  • गहलोत कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं
  • पायलट का़ नेतृत्व नहीं चाहते गहलोत समर्थक
  • गुर्जर बनाम मीणा फैक्टर भी अहम
  • पायलट की वफादारी पर सवाल

गहलोत कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं

कांग्रेस पार्टी में एक व्यक्ति एक पद के नियम के तहत अगर गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष बनते हैं, तो उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ेगी. गहलोत के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सचिन पायलट (Sachin Pilot) की ताजपोशी मानी जा रही है, पर गहलोत की कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी कुर्सी छोड़ने की इच्छा नहीं है. हालांकि वह अलग बात है. अगर अशोक गहलोत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा भी देते हैं, तो भी सचिन पायलट की ताजपोशी आसान नहीं है. उनके सामने गहलोत ही नहीं कई सियासी चुनौतियां सामने हैं.

पायलट का़ नेतृत्व नहीं चाहते गहलोत समर्थक

पायलट के समर्थक काफी समय से उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं. पायलट समर्थक विधायकों ने उन्हें मुख्यमंत्री न बनाने पर अंजाम भुगतने की भी चेतावनी दे रखी है. अगर बात करें राजस्थान में ज्यादातर कांग्रेस विधायकों के समर्थन की बात, तो सचिन पायलट के पास विधायकों के समर्थन की उतनी संख्या नहीं है, जितना की जरूरत है. अभी हाल ही में अशोक गहलोत ने विधायकों की बैठक बुलाकर अपना शक्ति प्रदर्शन किया. इससे कांग्रेस नेतृत्व को साफ संकेत दिया कि ज्यादातर विधायक उनके साथ हैं. एक बात और है कि गहलोत के समर्थकों के साथ कई वरिष्ठ विधायक भी पायलट के अंडर में काम करने को तैयार नहीं दिख रहे हैं.

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गुर्जर बनाम मीणा फैक्टर भी अहम

राजस्थान में गुर्जर बनाम मीणा समुदाय का फैक्टर भी बहुत मायने रखता है. गुर्जर समुदाय को बीजेपी का वोटर माना जाता है तो वही मीणा समुदाय कांग्रेस के साथ रहते हैं. सचिन पायलट का गुर्जर समुदाय के बीच अच्छा क्रेज है. ऐसे में अगर पायलट को राजस्थान की कुर्सी सौंपी जाती है, तो गुर्जर समुदाय का प्रभाव बढ़ेगा.इसके बाद मीणा समुदाय में रोष भी देखने को मिल सकता है क्योंकि मीणा बनाम गुर्जर समाज की अदावत जगजाहिर है. इस स्थिति को समझने के बाद कांग्रेस रिस्क नहीं लेना चाहेगी कि उसके वोट बैंक उससे दूर जाएं.

पायलट की वफादारी पर सवाल

अगर कांग्रेस के प्रति सचिन पायलट की वफादारी की बात करें तो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए पायलट ने 2018 में कांग्रेस को सत्ता वापसी कराने अहम भूमिका निभाई थी. पायलट की इसी मेहनत के कारण उन्हें राज्य के डिप्टी सीएम की कुर्सी सौंपी गई थी. लेकिन 2020 बगावत करने के बाद पायलट की डिप्टी सीएम की कुर्सी तो गई. साथ ही उन्हें प्रदेश अध्यक्ष के पद से ही हाथ धोना पड़ा. इसके बाद से उनकी पार्टी के प्रति वफादारी पर सवाल खड़े हो गए. दूसरी तरफ गहलोत की गांधी परिवार के प्रति वफादारी जगजाहिर है. उनके राहुल गांधी और सोनिया गांधी के साथ रिश्ते के साथ पार्टी में अच्छी पकड़ मानी जाती है.

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