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ठाणे के ‘ठाकरे’ Vs मुंबई के ठाकरे: महाराष्ट्र की सियासत में उथलपुथल का असली लब्बोलुआब

महाराष्ट्र की सियासत में आज जो कुछ भी हो रहा है, वो अनायास नहीं हो रहा है. यह ठाणे के ‘ठाकरे’ और मुंबई के ठाकरे के बीच की लड़ाई है, जो पहले भी कई बार सामने आ चुकी है.

Balasahab-Thackeray
ठाणे के 'ठाकरे' Vs मुंबई के ठाकरे: महाराष्ट्र की सियासत में उथलपुथल का असली लब्बोलुआब (File Photo)

महाराष्ट्र की सियासत में आज जो कुछ भी हो रहा है, वो अनायास नहीं हो रहा है. यह ठाणे के ‘ठाकरे’ और मुंबई के ठाकरे के बीच की लड़ाई है, जो पहले भी कई बार सामने आ चुकी है. अभी हाल ही में पूर्व सीएम नारायण राणे ने कहा था कि अगर एकनाथ शिंदे अगर यह कदम नहीं उठाते तो उनका हाल उनके गुरु आनंद दिघे जैसा हो जाता. उन्होंने यह भी कहा कि आनंद दिघे की मौत से पहले ही मातोश्री के दरवाजे उनके लिए बंद कर दिए गए थे. 2001 के अगस्त में आनंद दिघे सड़क हादसे में घालय हो गए थे और उनके समर्थकों का कहना था कि इलाज में लापरवाही के दौरान उनकी मौत हो गई थी. उनकी मौत से नाराज समर्थकों ने पूरे अस्पताल को आग लगा दी थी. अब आप सोच रहे होंगे कि आनंद दिघे की मौत से एकनाथ शिंदे की बगावत का क्या कनेक्शन है? जी हां, बहुत बड़ा कनेक्शन है.

खबर में खास
  • बालासाहब ठाकरे भी नहीं देते थे दखल
  • ठाकरे के बाद सबसे बड़े नेता थे दिघे
  • फिल्म धर्मवीर छोड़कर आ गए थे उद्धव
  • ठाणे के ठाकरे कहे जाते थे आनंद दिघे
बालासाहब ठाकरे भी नहीं देते थे दखल

दरअसल, आनंद दिघे एकनाथ शिंदे के गुरु थे और आज भी शिंदे अपने गुरु के प्रति बहुत आदर भाव रखते हैं. तभी तो अपना हुलिया उन्हीं की तरह बनाए रखते हैं. महाराष्ट्र की सियासत में ​एकनाथ शिंदे को आनंद दिघे का वारिस माना जाता है. बताया जाता है कि आनंद दिघे के फैसलों में बाला साहब ठाकरे भी दखल नहीं देते थे. खासतौर पर मसला अगर ठाणे से अगर जुड़ा होता था तो. दरअसल, बालासाहब ठाकरे अपने समय में ठाणे के मामले में दखल देने से बचते थे. इस तरह मुंबई और ठाणे को लेकर बाला साहब ठाकरे और आनंद दिघे के बीच पावर शेयरिंग होती थी. बताया जाता है कि आनंद दिघे के चलते ही ठाणे में शिवसेना ने शहर की सरकार बनाई थी और सत्ता का स्वाद चखा था. आज भी ठाणे में शिवसेना का सिक्का चलता है तो इसके पीछे आनंद दिघे की मेहनत को ही माना जाता है. इस कारण शिवसेना और महाराष्ट्र की सियासत में आनंद दिघे का कद लगातार बढ़ता रहा.

ठाकरे के बाद सबसे बड़े नेता थे दिघे

राजनीतिक जानकार बताते हैं कि एक समय शिवसेना में 2 पावर सेंटर हुआ करते थे. एक मुंबई का मातोश्री था तो दूसरा ठाणे जिले में धर्मवीर आनंद दिघे का आनंद आश्रम. हालांकि आधिकारिक रूप से बाला साहब ठाकरे और आनंद दिघे के बीच किसी रंजिश का जिक्र नहीं मिलता. हर कोई जानता है कि आनंद दिघे बालासाहब ठाकरे को अपना गुरु और भगवान मानते थे. उनकी बस यही चाहत थी कि ठाणे के मामले में ठाकरे कोई फैसला बिना उनसे पूछे न लें. बालासाहब भी इस बात को बखूबी समझते थे.

फिल्म धर्मवीर छोड़कर आ गए थे उद्धव

नारायण राणे ने यह भी कहा था कि आनंद दिघे को शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे से मिलने की अनुमति नहीं दी जाती थी. इसी कारण आनंद दिघे पर बनी फिल्म धर्मवीर को देखते हुए उद्धव ठाकरे बीच में ही निकल आए थे, क्योंकि बताया गया कि वे उस फिल्म का क्लाइमेक्स देखना नहीं चाहते थे. यह भी कहा जाता है कि धर्मवीर फिल्म में आनंद दिघे को बालासाहब के बराबर दिखाने की कोशिश की गई. फिल्म में यह भी दिखाया गया कि दिघे ने कैसे अपने गुरु बालासाहब ठाकरे के खिलाफ बगावत की थी.

ठाणे के ठाकरे कहे जाते थे आनंद दिघे

शिवसेना में बालासाहब ठाकरे के बाद आनंद दिघे का कदम इतना बड़ा हो गया था कि लोग उन्हें ठाणे का ठाकरे कहते थे. बालासाहब ठाकरे के बाद उन्हें शिवसेना का सबसे बड़ा और दबंग नेता माना जाता था. 27 जनवरी 1951 को पैदा हुए आनंद दिघे पर शिवसेना कार्यकर्ता की हत्या का आरोप लगा था, जिससे वे शिवसेना से नाराज भी थे. बाद में उन्होंने कई मौकों पर कांग्रेस का साथ दिया. उन्हें टाडा कानून के तहत पकड़ा भी गया था, जिसमें वे जमानत पर रिहा हुए थे.

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