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महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार के वर्चस्व का तिलिस्म टूटा, पीएम मोदी के आविष्कार देवेंद्र फडणवीस नए चाणक्य

बताया जा रहा है कि एक जुलाई को बीजेपी महाराष्ट्र में सरकार बनाएगी और देवेंद्र फडणवीस नए मुख्यमंत्री तो एकनाथ शिंदे डिप्टी सीएम हो सकते हैं.

Devendra Fadnavis
महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार के वर्चस्व का तिलिस्म टूटा, देवेंद्र फडणवीस बने नए चाणक्य (ANI)

उद्धव ठाकरे ने आखिरकार इस्तीफा दे दिया और राज्यपाल ने उनका इस्तीफा भी स्वीकार कर लिया है. इसी के साथ ही एक सप्ताह से महाराष्ट्र की राजनीति में चले आ रहे असमंजस का दौर भी खत्म हो गया. इसी के साथ ही देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनने का रास्ता भी साफ हो गया. बताया जा रहा है कि एक जुलाई को बीजेपी महाराष्ट्र में सरकार बनाएगी और देवेंद्र फडणवीस नए मुख्यमंत्री तो एकनाथ शिंदे डिप्टी सीएम हो सकते हैं. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बगावत भले ही 21 जून की रात को हुई हो लेकिन इसकी पटकथा काफी पहले से लिखी चुकी थी. इस कहानी के कई पात्र हैं, जिसमें बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) का नाम सबसे अहम है. खुद महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले शरद पवार ने राज्यसभा चुनाव के समय ही देवेंद्र फडणवीस के राजनीतिक कौशल की तारीफ की थी. पवार ने कहा था, भाजपा तीसरी सीट जीतने का करिश्मा सिर्फ फडणवीस की वजह से कर सकी है. उन्होंने कहा कि देवेंद्र फडणवीस निर्दलीय उम्मीदवारों को अपने पक्ष में करने में कामयाब रहे, इसी ने चुनाव नतीजों में बड़ा फर्क पैदा किया.

खबर में खास
  • ‘मैं समंदर हूं, लौट के आऊंगा’
  • बजट सत्र में फडणवीस ने बुना जाल
  • जांच एजेंसियों से शिवसेना नेताओं को छूट
  • राज्यसभा-MLC चुनाव में मजबूत हुआ रिश्ता
  • बागियों ने सरकार से खींचा समर्थन
‘मैं समंदर हूं, लौट के आऊंगा’

2019 में बीजेपी और शिवसेना का वर्षों पुराने रिश्ते का अंत बड़ा दुखद हुआ. तब दोनों दलों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. लेकिन चुनाव नतीजों के बाद शिवसेना अपना सीएम बनाने को लेकर अड़ गई. बस इसी बात को लेकर बीजेपी और शिवसेना का तलाक हो गया. देवेंद्र फडणवीस ने फिल्मी स्टाइल में एनसीपी को तोड़कर रातों-रात सरकार बना ली. शरद पवार के भतीजे अजीत पवार को डिप्टी सीएम बनाया गया. हालांकि शरद पवार के एक्टिव होते ही अजीत पवार ने सरेंडर कर दिया. इस तरह से ये गठबंधन कुछ घंटों में ही टूट गया. इसके बाद उद्धव ठाकरे ने एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई. तब देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि ‘मैं समंदर हूं, लौट के आऊंगा..’ उनकी ये बात आज सही साबित होते हुए दिख रही है.

बजट सत्र में फडणवीस ने बुना जाल

देवेंद्र फडणवीस ने शिवसेना में टूट की पूरी कहानी कुछ पार्ट में लिखी थी. वे शुरू से इसी पर काम कर रहे थे, लेकिन किसी को इसकी भनक नहीं लग रही थी. फडणवीस हमेशा से ही शिवसेना के नेताओं के संपर्क में रहे. अपने पुराने संबंधों का फायदा लेते हुए वे शिवसेना के दिग्गज नेताओं की ताकत को भांपते रहे. जैसे ही उन्हें एहसास हुआ कि एकनाथ शिंदे उनके काम को आसानी से पूरा कर सकते हैं, उन्होंने शिंदे पर डोरे डालने शुरू किए. बजट सत्र में ही उन्होंने शिवसेना की टूट की नींव रख दी थी. बजट सत्र में फडणवीस ने शिंदे से गर्मजोशी से मुलाकात की और अपने ही कार्यकाल में लागू किए कुछ फैसलों की आलोचना करते हुए उन्हें वापस लेने की अपील की.

जांच एजेंसियों से शिवसेना नेताओं को छूट

फडणवीस हमेशा से ही शिंदे के कामकाज की तारीफ करते रहे. अपनी सरकार की गलतियों को बताकर वे उनका भरोसा जीतते रहे. पिछले एक साल से कई शिवसेना नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि मौजूदा सरकार में उन्हें इग्नोर किया गया है. दूसरी ओर एनसीपी नेताओं पर केंद्रीय जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता रहा, लेकिन शिवसेना नेताओं को इससे दूर रखा गया. बीजेपी की ये रणनीति काफी काम आई. भले ही पार्टी आलाकमान के सामने कोई कुछ ना बोलता हो, लेकिन शिवसेना के नेताओं का बीजेपी से रिश्ता कायम रहा. बीजेपी को इसका फायदा राज्यसभा और एमएलसी चुनाव में भी देखने को मिला.

राज्यसभा-MLC चुनाव में मजबूत हुआ रिश्ता

फडणवीस को पहली बार शिवसेना विधायकों के साथ अपने संबंध चेक करने का मौका राज्यसभा चुनाव के दौरान मिला. उन्होंने नबंर नहीं होने के बाद भी अपनी दम पर तीन प्रत्याशियों को खड़ा किया. 3 जून को महाविकास अघाड़ी (MVA) का एक प्रतिनिधिमंडल फडणवीस से मिला. इसमें एनसीपी के नेता छगन भुजबल और शिवसेना नेता अनिल देसाई थे. उन्होंने प्रस्ताव रखा कि राज्यसभा से तीसरा प्रत्याशी वापस लो, बदले में MLC की एक सीट ले लो. लेकिन फडणवीस ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया. वे ‘ऑपरेशन लोटस’ से पहले अपनी ताकत को चेक करना चाहते थे.

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